Friday, 23 October 2015

OSSC में निकली रिक्त पदों पर भर्तियां

ओडिशा कर्मचारी चयन आयोग (ओएसएससी) ने जूनियर क्लर्क एवं असिस्टेंट के 417 पदों हेतु आवेदन आमंत्रित किए जा रहे हैं। इस पद के लिए योग्य उम्मीदवार दिनांक 30 अक्टूबर, 2015 तक आवेदन कर सकते हैं।

पदों का नाम व पदों की संख्या
1. जूनियर क्लर्क : 288 कुल पद।
2. जूनियर असिस्टेंट : 129 कुल पद।

पदोंकी संख्या : 417 कुल पद।
शैक्ष्निक योग्यता: इस पद के लिए उम्मीदवार को 12वीं अथवा समकक्ष परीक्षा पास की हो। बेसिक कंप्यूटर कौशल प्राप्त हो।
आवेदन फीस: Nil
आवेदन कैसे करें: योग्य उम्मीदवार पदों की जानकारी, वेतन, आयु सीमा, योग्यता और अन्य शर्तो के लिए नीचे दिए गए लिंक के माध्यम से पूर्ण जानकारी प्राप्त कर सकते हैं  तथा online apply भी कर सकते हैं .
online.odishassc.in/

Common Error Rules

दोस्तों आज हम common error से related rules share कर रहे है। ये श्रृंखला आगे भी चलता रहेगा।

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1. Certain nouns possess a singular form but still represent plurality and thus, take a plural verb when used in a sentence.
E.g. Cattle, peasantry, people, clergy, police 
The Police has come. ❎
The Police have come. ✔

2. Certain nouns always take the plural verb because their form is always plural. E.g. Scissors, trousers, spectacles, thanks, premises. 
The scissors is kept on the table. ❎
The scissors are kept on the table.✔

3. When a number is followed by a noun denoting measure, length, money, number or weight, the form of the nouns does not change so long as they are followed by another noun or pronoun. e.g. Million, Pair, meter, year, dozen, foot, head. 
This is a nine meters cloth. ❎
This is a nine-meter cloth. ✔

4. When a number is followed by a noun denoting measure, length, money, number or weight, but these are not followed by another noun or pronoun, then they take the plural form.
E.g. Million, pair, meter, year, dozen, foot, head. 
This sari is nine yard long. ❎
This sari is nine yards long. ✔

5. Certain nouns, especially of the collective category, are used as singular when they specify a unit.
E.g. Public, team, committee, government, audience, orchestra, company, jury
 The public were unanimous in their opinion. ❎
The public was unanimous in its opinion. ✔

6. Certain nouns, especially of the collective category, are used in plural when they specify a difference of opinion or class.
E.g. Public, team, committee, government, audience, orchestra, company, jury. 
The jury was divided in its opinion. ❎ 
The jury were divided in their opinion. ✔

7. If the pronoun „one‟ is used, it must be maintained throughout the sentence.
 One must respect his elders. ❎
One must respect one’s elders. ✔

8. The word „whose‟ is used for living people and „which‟ is used for nonliving things or ideas. 
Which box is kept on the table? ❎
Whose box is kept on the table? ✔

9. „Less‟ is used to denote quantity while „fewer‟ is used to denote number. 
No less than twenty people were ❎
No fewer than twenty people were✔

10. „One of‟ is always followed by noun in the plural form. 
She is one of the least important person in the office. ❎ 
She is one of the least important people in the office. ✔

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Thanks !
  आपका दोस्त राहुल !!!

12वीं पास उम्मीदवारों के लिए 722 वैकेंसी

ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ECL) ने वैकेंसी निकाली है. इच्छुक उम्मीदवार 12 नवंबर तक आवेदन कर सकते हैं. पद का नाम:
सर्वेयर
Mining Sirdar
ओवरसियर योग्यता: 12वीं पास
उम्र सीमा : 18-30 साल
चयन प्रक्रिया: उम्मीदवारों का चयन लिखित परीक्षा और वाइवा के आधार पर किया जाएगा
आवेदन फीस: 300 रुपये
सैलरी : 19,035-20,552 रुपये
पदों की संख्या: 722
ज्यादा जानकारी के लिए लिंक: http://www.easterncoal.gov.in/

Thursday, 22 October 2015

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले मित्रों के लिए - 3 (जब तक तोडूंगा नही तब तक छोडूंगा नही)

दोस्तों आज के अंक में हम पेश करते है । एक और motivational लेख । आशा है की आपको ये पसंद आएगी। दोस्तों एक बात हमेशा यद् रखना अगर लक्ष्य पाना है तो दिल में लक्ष्य पाने की जिद्द और आग होना चाहिए। आग लगाना चाहिए । ये बात यद् रखना दोस्तों दुनिया में कुछ भी असंभव नही है। बस burning desire होनी चाहिए ।
कई बार जिंदगी में ऐसा होता है कि आपने खूब मेहनत की और आपको अपने सुखद परिणाम की आशा थी मगर नतीज़े आशाओं और अपेक्षाओं के विपरीत निकले। आपने फिर प्रयास किया और साबित करने की कोशिश की , कि आप निराश नहीं होंगे और अपनी मंज़िल को पाकर रहेंगे। इस बार फिर से आप नाकामयाब रहे और इसके बाद इस तरह से निराश हुए कि व्यवस्था या किस्मत में ही दोष मानकर खुद को तसल्ली दे रहे हैं। मित्रो, ऐसा ज्यादातर अभ्यर्थियों के साथ होता है और मेरी नज़र में यही एक फर्क है जो एक सफल और असफल में रह जाता है। इसको समझने की कोशिश करते हैं - माना कि 'अ' ने बार बार प्रयास किया मगर हर बार पूर्ण तैयारी के बावज़ूद असफल रहा। 'अ' अब मानता है कि उसकी किस्मत खराब है या किस्मत में ही नहीं लिखा है कि वो कुछ बने। उसके पास इसके जवाब में आपको या मुझे कहने के लिए  कुछ तर्क है जैसे -
1. 'ब' या 'स' को तो कुछ भी नहीं आता है। कभी भी आप उसकी और मेरी किसी विषय पर पकड़ देख लीजिए , फिर भी वह तो चयनित हो गया और मैं अभी भी असफल।
2. जो कामयाब हो गए है आपकी तरह , वो ये डायलॉग मार सकते हैं कि किस्मत - विस्मत कुछ नहीं होती है। कामयाबी पाने के बाद कहना सरल है अगर बेरोजगार होते तो ऐसा नहीं कहते।
3. व्यवस्था में कमी हैं - चैक , जैक आदि आदि
        मित्रो , अब मैं इन तीनों के बारे में  'अ' से कुछ पूछना और कहना चाहता हूँ -
1. आपने किस आधार पर माना कि आपकी तैयारी बहुत अच्छी है और आप चुने जाने के लिए पात्र हैं? क्या किसी कोचिंग सेंटर में आपके उससे ज्यादा नंबर आ जाते हैं या कभी अपने कमरे में तैयारी करते वक़्त आपने उससे कुछ सवाल पूछे और उसको नहीं आए , इन सब के आधार पर आप अपनी तैयारी को बेहतर बता सकते हैं? हो सकता है कि किसी अभ्यर्थी की सचमुच विषय पर  ज्यादा बेहतर पकड़ हो मगर यदि वह परीक्षा कक्ष के वातावरण में घबरा जाता है या उसका समय प्रबंधन दूसरे अभ्यर्थी जिसकी अपेक्षाकृत विषय पर पकड़ तो कमज़ोर है मगर वह प्रस्तुतीकरण और समय प्रबंधन में बेहतर है, से कमतर है तो हो सकता है कि वह अनुतीर्ण हो जाए और बाद वाला चयनित । तो क्या ऐसे में किस्मत को दोष दिया जा सकता है ? मित्रो , अपनी तैयारी का मूल्यांकन आप विषय पर प्रामाणिक पकड़ , प्रभावी प्रस्तुतीकरण , तथ्य - सैद्धांतिक व्याख्या , व्यावहारिक समझ और समय प्रबंधन की कसौटियों पर करें। कई अन्य सूक्ष्म कारक भी हैं जैसे हस्तलेखन , सुपाठ्यता , लेखनगति आदि जिन्हें भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
2. किसी रास्ते को पार करने वाला ही तो बता सकता है कि उस रास्ते पर कहाँ कांटे हैं या कहाँ गढ्ढा है। अब उसी तरह सफल होने वाले को लगता है कि सही और नियोजित तैयारी से अगर कोई परीक्षा देता है तो सफल हो ही जाता है इसीलिए किस्मत कुछ नहीं होती है।  अगर कोई ऐसा कहता है तो आप उससे सहमत क्यों नहीं हैं? आपने अपने साथ किस्मत को जोड़कर खुद को निर्दोष बना लिया है। वास्तव में आपकी तैयारी  और परीक्षा में प्रस्तुतीकरण में  ही कहीं न कहीं त्रुटि रही होगी वरना व्यक्तिश: और संस्थागत तौर पर तो चयनकर्त्ता आपके दुश्मन नहीं हैं।
3. व्यवस्था को दोष क्यों देते हैं आप ? कभी भी कोई सीधे सीधे आपसे मिला जिसने कहा हो कि उसने फलां फलां पदीय व्यक्ति को इस तरह से रिश्वत दी तो मैं चयनित हो गया और अगर ऐसा है भी तो हम उन चयनित उदाहरणों को सामने क्यों नहीं रखते हैं जो गरीब पृष्ठभूमि से निकले हैं  और जिन्होंने अपनी पढ़ाई भी तंगहाली में की है। क्या रिक्शेवाले या मज़दूर के बेटे या किसी वेटर या किसी झुग्गीझौंपड़ी वाले के आईएएस या अन्य उच्च सेवाओं में चुना जाना हमने नहीं सुना है ? उनके पास तो साक्षात्कार के लिए अच्छी औपचारिक ड्रेस खरीदने के भी पैसे नहीं थे। फिर भी वे सब चुने गए। मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि हम सभी लोग अपनी सुविधा के हिसाब से तर्क और उदाहरण चुनते हैं।
       
                     मित्रो , मेरा इस आलेख के पीछे एक बहुत ही पवित्र-सा उद्देश्य है कि आप बराएमेहरबानी किस्मत / चैक-जैक /व्यवस्था को आपके और आपकी कामयाबी के बीच नहीं लाएं। सफलता सिर्फ एक वाक्य से परिभाषित हो सकती है मगर असफलता के लिए चारों तरफ देखना पड़ता है और फिर कई तर्कों [ या कुतर्कों ? ] को अपने पक्ष में तलाशना पड़ता है। कामयाबी के लिए आपको निरंतर प्रयास की आवश्यकत्ता है। आप परीक्षा आवेदन भरकर चंद महीनों या हफ्तों कि तैयारी से उसे पीछे नहीं छोड़ सकते हैं जिसने लम्बे समय से लक्ष्यानुरूप मेहनत की हो और विषय को आत्मसात किया हो। मेरा आपसे अनुरोध है कि व्यर्थ की निराशाजनक बातों को ना सुनें और केवल सकारात्मक सोचते हुए आगे बढ़ें और अपने सपनों को छूएं।  
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रहेगा Thanks !
  आपका दोस्त राहुल ।

यूपीएससी टॉपर गौरव अग्रवाल की success story & success tips

यूपीएससी टॉपर रहे राजस्थान के गौरव अग्रवाल का कहना है कि सफलता के लिए ज़रूरी है कि इंसान अपनी कमी को छिपाने के बजाए उसे स्वीकार करे और उसमें सुधार लाने की कोशिश करे।
गौरव अग्रवाल जयपुर का रहने वाला है। मेरे पिता श्री एसपी गुप्ता जयपुर डेयरी केंद्र में मैनेजर हैं और मेरी मां गृहिणी हैं। मेरी एक बड़ी बहन हैं, जिनकी शादी हो चुकी है और वो इस समय अमेरिका में हैं। मेरे जीजाजी माइक्रोसॉफ्ट में काम करते हैं।
मैंने अपनी शुरुआती पढ़ाई जयपुर के एडमंड्स स्कूल से की। उसके बाद मैंने आईआईटी कानपुर से कंप्यूटर साइंस में बीटेक किया। आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में पूरे भारत में मेरी 45वीं रैंक आई थी। आईआईटी के बाद मैंने आईआईएम लखनऊ से एमबीए किया। आईआईएम में मुझे गोल्ड मेडल मिला।
इसके बाद मैंने क़रीब चार साल तक हांग-कांग में सिटी ग्रुप में काम किया। मैं इनवेस्टमेंट बैंकिंग में काम करता था। मैंने वहां 2011 के अंत तक काम किया। उसके बाद वो जॉब छोड़कर आईएएस की तैयारी करने लगा। पिछले साल पहले प्रयास में मेरी 244 रैंक आई। इसके बाद मुझे राजस्थान कॉडर में आईपीएस मिला और फिर इस साल पहली रैंक आ गई।
 गौरव का मानना है कि अपनी कमजोरियों का सामना करके बड़ी से बड़ी कामयाबी हासिल की जा सकती है।
आप इतने प्रतिभावान छात्र रहे हैं। आपने किस तरह से पढ़ाई की और कितनी मेहनत की?
गौरव अग्रवाल: देखिए, मेहनत तो सभी करते हैं। मेरा हमेशा से मानना रहा है कि आम तौर पर इस तरह की परीक्षाओं में हमें कभी भी दूसरों से प्रतिस्पर्धा नहीं करनी चाहिए। हमें बस अपने आप को और बेहतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए। तो हर रोज़ अपने आप से प्रतिस्पर्धा कीजिए।
ये कि अगर आपको कभी भी अपनी किसी कमी के बारे में पता चलता है तो उसे छिपाने या उससे डरने के बजाए उनको स्वीकार कीजिए और उनमें सुधार लाने की कोशिश कीजिए। अपनी पूरी मेहनत कीजिए और फिर जो होना होगा, देखा जाएगा। आप इस सफलता के पीछे क्या वजह मानते हैं?
गौरव अग्रवाल: सफलता के पीछे मेहनत तो एक वजह होती ही है। इसके अलावा अपने घरवालों और दोस्तों का पूरा सहयोग था और फिर क़िस्मत होती है। भारतीय प्रशासनिक सेवा को काफी चुनौतीपूर्ण माना जाता है।
माता-पिता से कितना बड़ा सहयोग मिला?
गौरव अग्रवाल: बचपन से लेकर आज तक उन्होंने ही प्रोत्साहित किया। पापा मेरी और मेरी बहन की पढ़ाई में काफ़ी रुचि लेते थे। आईएएस की पढ़ाई में भी पापा ने काफ़ी साथ दिया।
मेरे मौसा जी और मेरे फूफा जी ने भी मेरा मार्गदर्शन किया। सबके साथ और सबके आशीर्वाद से ही इस तरह की सफलता मिल पाती है। इतने साल तक आपने निवेश बैंकर तक काम किया। मेरा आकलन है कि आपको विदेश में अच्छा-ख़ासा वेतन मिल रहा होगा। : प्रशासनिक सेवा जैसे जॉब काफ़ी अलग होते हैं। इस तरह के जॉब आपको निजी क्षेत्र में नहीं मिल सकते हैं। इनमें आप सीधे जनता से रूबरू होते हैं। आपको लोगों के बीच में जाना होता है। लोगों की समस्याओं को हल करना होता है। इसलिए ये जॉब मुझे काफ़ी अपील करती है।
आप क्या प्रशासनिक बदलाव लाना चाहते हैं?
गौरव अग्रवाल: जी हां, ये तो समय ही बदलाव का है। तो बदलाव तो आएंगे ही। हम भी एक नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। हमारे यहां प्रशासन से जुड़े कुछ मसले हैं। जैसे फ़ाइलें लटकी रहती हैं। कुछ काम नहीं होता। आमतौर पर प्रशासन की नागरिकों के प्रति सहानुभूति नहीं रहती। हमें इस माहौल को बदलना होगा।
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